Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की वैधता को चुनौती पर सुनवाई नहीं होगी


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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम-1992 के प्रावधानों की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, कार्यवाही की बहुलता से बचा जाना चाहिए। सीजेआई यूयू ललित, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा, अखबार में कुछ पढ़कर लोग अदालत का रुख करने लगते हैं।

जस्टिस भट ने कहा, अदालतों पर भार की कल्पना कीजिए। दायर की गई प्रत्येक रिट याचिका को सूचीबद्ध करनी होती है। शुरुआत में पीठ ने पूछा कि एक ही मामला बार-बार क्यों आ रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा, वर्तमान मामले में पक्षकार अलग-अलग हैं।

इस पर सीजेआई ने कहा, इससे कार्यवाही की बहुलता हो रही है। इसे वापस लें और लंबित मामले में हस्तक्षेप की मांग करें, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने लंबित मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने की स्वतंत्रता के साथ याचिका को वापस ले लिया।

याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा- 2 (सी) के तहत प्रावधानों को अनुच्छेद- 14, 15, 21, 29 और 30 के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया था। याचिका में इसे असांविधानिक और शून्य करार देने की मांग की गई थी।

याचिका के अनुसार, लद्दाख में हिंदुओं की आबादी महज एक फीसदी, मिजोरम में 2.75 फीसदी, लक्षद्वीप में 2.77 फीसदी, कश्मीर में 4 फीसदी, नगालैंड में 8.74 फीसदी, मेघालय में 11.52 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश में 29 फीसदी, पंजाब में 38.49 फीसदी और मणिपुर में 41.29 फीसदी है।

बावजूद इसके केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत उन्हें ‘अल्पसंख्यक’ घोषित नहीं किया है। याचिका में कहा गया है कि हिंदुओं को अनुच्छेद- 29 व 30 के तहत संरक्षित नहीं किया गया है और वे अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान की स्थापना या प्रशासन नहीं कर सकते हैं।

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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम-1992 के प्रावधानों की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, कार्यवाही की बहुलता से बचा जाना चाहिए। सीजेआई यूयू ललित, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा, अखबार में कुछ पढ़कर लोग अदालत का रुख करने लगते हैं।

जस्टिस भट ने कहा, अदालतों पर भार की कल्पना कीजिए। दायर की गई प्रत्येक रिट याचिका को सूचीबद्ध करनी होती है। शुरुआत में पीठ ने पूछा कि एक ही मामला बार-बार क्यों आ रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा, वर्तमान मामले में पक्षकार अलग-अलग हैं।

इस पर सीजेआई ने कहा, इससे कार्यवाही की बहुलता हो रही है। इसे वापस लें और लंबित मामले में हस्तक्षेप की मांग करें, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने लंबित मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने की स्वतंत्रता के साथ याचिका को वापस ले लिया।

याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा- 2 (सी) के तहत प्रावधानों को अनुच्छेद- 14, 15, 21, 29 और 30 के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया था। याचिका में इसे असांविधानिक और शून्य करार देने की मांग की गई थी।

याचिका के अनुसार, लद्दाख में हिंदुओं की आबादी महज एक फीसदी, मिजोरम में 2.75 फीसदी, लक्षद्वीप में 2.77 फीसदी, कश्मीर में 4 फीसदी, नगालैंड में 8.74 फीसदी, मेघालय में 11.52 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश में 29 फीसदी, पंजाब में 38.49 फीसदी और मणिपुर में 41.29 फीसदी है।

बावजूद इसके केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत उन्हें ‘अल्पसंख्यक’ घोषित नहीं किया है। याचिका में कहा गया है कि हिंदुओं को अनुच्छेद- 29 व 30 के तहत संरक्षित नहीं किया गया है और वे अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान की स्थापना या प्रशासन नहीं कर सकते हैं।



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