सपा का प्लान 2024 : अखिलेश यादव के सामने ये पांच बड़ी चुनौतियां, इनसे निपटे बिना सफलता मिलना मुश्किल

सार

चुनाव हारने के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पूरी तरह से यूपी पर फोकस कर लिया है। विधानसभा में नेता विपक्ष के रूप में वह सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हैं। सोमवार को उन्होंने विधायक के रूप में शपथ भी ले ली।

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समाजवादी पार्टी ने चुनाव के बाद नए सिरे से तैयारी में जुट गई है। पार्टी का फोकस अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। इसके लिए सपा मुखिया अखिलेश यादव ने खुद कमान संभाल ली है। पार्टी का दावा है कि जो 2022 में नहीं हो पाया वो 2024 लोकसभा चुनाव में हो जाएगा। मतलब लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को यूपी में मात देने की तैयारी है। 

हालांकि, आंकड़ों और परिस्थितियों को देखें तो ऐसा करना सपा के लिए इतना आसान भी नहीं है। विधानसभा चुनाव हारने वाले अखिलेश यादव के सामने अभी पांच बड़ी चुनौतियां हैं। 2024 में वह भाजपा और अन्य विपक्षी दलों से तभी मजबूत मुकाबला कर पाएंगे, जब इन चुनौतियों का निपटारा कर पाएंगे।
1. सहयोगियों को एकजुट रखने की चुनौती : 2017 विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और बुरी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद ये गठबंधन टूट गया।  2019 लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने बसपा को साथ लिया, फिर भी हार गए। चुनाव में मिली हार के हफ्तेभर से भी कम समय में ये गठबंधन भी टूट गया।  2022 में सपा प्रमुख ने आरएलडी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी समेत 10 छोटे दलों को साथ रखा। नतीजा रहा कि वह भाजपा के खिलाफ जीत तो नहीं पाए, लेकिन लड़ाई में बने रहे। खुद सपा ने भी वोट प्रतिशत के लिहाज से अपने इतिहास का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। लगातार तीन चुनाव में गठबंधन बदलने वाले अखिलेश को अपने इन सहयोगी दलों को आगे भी एकजुट रखने की बड़ी चुनौती होगी।  

2. दलित वोटर्स के बीच पैठ बनाना: इस बार चुनाव से पहले भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के साथ अखिलेश यादव की कई बार बैठकें हुईं। माना जा रहा था कि चंद्रशेखर भी सपा के गठबंधन में शामिल होंगे। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सीटों को लेकर दोनों के बीच विवाद हो गया और चंद्रशेखर ने किनारा कर लिया। इसका असर सपा की सीटों पर पड़ा। दलितों का साथ नहीं मिला और सपा हार गई। अखिलेश के लिए दलित वोटर्स के बीच पैठ बनाना बड़ी चुनौती है। ऐसे में चंद्रशेखर जैसे उभरते दलित नेताओं को भी अखिलेश अपने साथ लाने की चुनौती होगी। सपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 2024 की तैयारी के तहत अखिलेश ने एक बार फिर से चंद्रशेखर को गठबंधन में लाने की कोशिश शुरू कर दी है। 

3. चाचा शिवपाल की नाराजगी : विधानसभा चुनाव के परिणाम आते ही अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच दूरियां बढ़ गईं। अखिलेश ने शिवपाल को विधायकों की बैठक में भी नहीं बुलाया। शिवपाल भी खुले मंच से अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। अगर दोनों के बीच की ये दूरियां समय रहते दूर नहीं हुईं तो सपा को 2024 लोकसभा चुनाव में इसका बड़ा नुकसान हो सकता है। 2019 के नतीजे इसके उदाहरण हैं। तब शिवपाल सिंह यादव ने 120 उम्मीदवार उतारे थे। उनकी पार्टी ने एक भी सीट पर जीत तो नहीं हासिल की, लेकिन फिरोजाबाद समेत 12 सीटों पर सपा उम्मीदवारों की हार का कारण बनी थी।   

4. आपराधिक छवि को बदलना : भाजपा लगातार सपा पर आपराधियों बढ़ावा देने और उन्हें संरक्षण देने वाली पार्टी होने का आरोप लगाती रही है। बीते चुनाव में भी सपा सरकार में होने वाली अपराधिक घटनाओं और उसके नेताओं के आपराधिक रिकॉर्ड के मुद्दे को भाजपा ने खूब उठाया था। पिछली बार लड़े सपा के 62% उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। सपा के लिए इस छवि से बाहर निकलने की भी बड़ी चुनौती है। 

5.  मुस्लिम वोटर्स को साथ रखने की चुनौती : इस बार चुनाव में मुस्लिम वोटर्स ने समाजवादी पार्टी का खूब साथ दिया। सिर्फ एक सीट जीत सकी बसपा ने मुस्लिम वोटरों को अपने साथ दोबारा जोड़ने के लिए नए सिरे से कोशिश शुरू कर दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने हार के बाद कहा कि अगर भाजपा को सत्ता से बाहर करना है तो मुस्लिम और दलित को एकसाथ आना होगा। यूपी में 21% दलित वोटर्स हैं, जबकि करीब 20% मुस्लिम। मायावती इसी फैक्टर को 2024 और फिर 2027 चुनाव में एकसाथ लाना चाहती हैं। अगर मुस्लिम फिर से बसपा की ओर जाते हैं तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा। ऐसे में अखिलेश यादव के सामने इन मुस्लिम वोटर्स को साथ रखने की बड़ी चुनौती भी है।
सपा मुखिया अखिलेश यादव ने यूपी में योगी सरकार को घेरने के लिए ही लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर विधानसभा में बने रहने का फैसला लिया है। वह विधानसभा में विपक्ष के नेता भी चुन लिए गए हैं। बतौर सांसद अखिलेश यादव ज्यादातर समय दिल्ली में गुजारते थे। इसके चलते उनपर यूपी से दूरी बनाने का कई बार आरोप भी लगता रहा है। इस बार मिली हार के बाद अखिलेश ने अपनी रणनीति बदली है। अब वह दिल्ली की बजाय यूपी की राजनीति पर फोकस कर रहे हैं। नेता विपक्ष के नाते अखिलेश अब सड़क से लेकर विधानसभा तक सरकार को घेरने का मन बना चुके हैं।

विस्तार

समाजवादी पार्टी ने चुनाव के बाद नए सिरे से तैयारी में जुट गई है। पार्टी का फोकस अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। इसके लिए सपा मुखिया अखिलेश यादव ने खुद कमान संभाल ली है। पार्टी का दावा है कि जो 2022 में नहीं हो पाया वो 2024 लोकसभा चुनाव में हो जाएगा। मतलब लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को यूपी में मात देने की तैयारी है। 

हालांकि, आंकड़ों और परिस्थितियों को देखें तो ऐसा करना सपा के लिए इतना आसान भी नहीं है। विधानसभा चुनाव हारने वाले अखिलेश यादव के सामने अभी पांच बड़ी चुनौतियां हैं। 2024 में वह भाजपा और अन्य विपक्षी दलों से तभी मजबूत मुकाबला कर पाएंगे, जब इन चुनौतियों का निपटारा कर पाएंगे।

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