वजन कम करने के साथ कोलेस्ट्रॉल भी घटाती है अरहर, जानें इस दाल से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें

हाइलाइट्स

वैदिक काल से लेकर पुराणों तक में अरहर दाल का वर्णन मिलता है.
ओडिशा के उत्तर पाषाण कालीन अवशेषों में तूअर के बीज मिले हैं.
महाराष्ट्र में देश की कुछ 30 प्रतिशत अरहर दाल का उत्पादन होता है.

दाल की बात करते ही दिल-दिमाग में सबसे पहले अरहर (Tur) की दाल का नाम आता है. पूरे भारत में सबसे ज्यादा दाल अरहर की ही खाई जाती है. उसके पीछे कारण यह है कि जितनी भी दालें हैं, उनमें अरहर का स्वाद सबसे बढ़िया है. शरीर के लिए भी यह बेहद लाभकारी है. इसमें प्रोटीन और फाइबर तो है हीं फोलिक अम्ल (Folate) भी पाया जाता है, जो शरीर में क्षतिग्रस्त होती कोशिकाओं को लगातार रिपेयर करता है. हजारों सालों से भारत का प्रिय भोजन है दाल. आयुर्वेद में इसकी खूब प्रशंसा की गई है.

तड़का दाल के तौर पर भी है फेमस

जब भी ‘तड़का’ दाल की बात होगी तो अरहर की भरी कटोरी ही सामने दिखाई देने लगेगी. मक्खन-देसी घी, जीरे का तड़का इसके स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है. मध्य भारत में इसे रोटी व चावल के साथ खाया जाता है तो दक्षिण भारत में बनाए जाने वाले सांभर का यह मुख्य घटक है. भारत में अनेकों दालों की पैदावार होती हैं, लेकिन अरहर का ‘जवाब नहीं’ है. आपको बता दें कि विश्व में सबसे अधिक दालों (दलहन) का उत्पादन भारत में ही होता है ओर सबसे अधिक खपत भी भारत में होती है.

विश्व में सबसे अधिक दालों (दलहन) का उत्पादन भारत में ही होता है

अरहर की बात करें तो दुनिया के 50 से अधिक उष्णकटिबंधीय देशों में विशेष रूप से एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के शुष्क क्षेत्रों में यह खूब उगती है. एक जानकारी के अनुसार अरहर की सबसे ज्यादा खेती भारत, म्यांमार, केन्या, मलावी, तंजानिया, युगांडा, अफगानिस्तान आदि में होती है. भारत में इसकी सबसे अधिक खेती महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र और गुजरात में होती है. महाराष्ट्र में देश के कुल उत्पादन की सबसे अधिक 30 प्रतिशत अरहर पैदा होती है.

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पाषाकालीन सभ्यता के अवशेषों में मिले हैं इसके बीज

अरहर की उत्पत्ति को लेकर दो विचारधाराएं हैं. एक का कहना है कि इसकी खेती भारत से शुरू हुई, जबकि दूसरा मत मानता है कि अरहर अफ्रीका के जंगलों (खेती नहीं) में पैदा हुई. अमेरिका स्थित ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की वनस्पति विज्ञानी प्रो. सुषमा नैथानी का स्पष्ट कहना है कि अरहर की उत्पत्ति एशियाटिक विशेषकर इंडो-बर्मा उपकेंद्र में हुई, जिसमें भारत का पूर्वी क्षेत्र व म्यांमार शामिल है. इतिहास की किताबों में भी कहा गया है कि भारत में अरहर की खेती का जन्मस्थल पूर्वी भारत (ओडिशा) है. उड़ीसा में उत्तर पाषाण कालीन अवशेषों में तुअर बीज (3400- 3000 ईसा पूर्व) मिले हैं. इसके अलावा अरहर के बीजों की जानकारी 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व पुरातात्विक खोज में दक्षिण भारत (संगनाकल्लू) और इसके सीमावर्ती क्षेत्रों (महाराष्ट्र के तुलजापुर गढ़ी और उड़ीसा में गोपालपुर में नवपाषाण स्थलों पर पाई गई है.

वैदिक काल से लेकर पुराणों, आयुर्वेदिक ग्रंथों मे वर्णन

वैदिक काल भी अरहर व अन्य दालों का वर्णन किया गया है. भारत के खाद्य वैज्ञानिक व इतिहासकार केटी आचार्य की पुस्तक Indian Food: A Historical Companion में बताया गया है कि ऋगवेद, यजुर्वेद के अलावा मार्कंडेय पुराण व विष्णु पुराण आदि में कई दालों का वर्णन हैं, जिनमें माश, मसूर, मुदगा, कलया, मटर शामिल है. प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरकसंहिता व सुश्रुतसंहिता (ईसा पूर्व 7वीं शती) में आढकी (अरहर) के ढेरों गुण-दोषों का उल्लेख है और इसे कफ, पित्त व वातनाशक माना गया है.

arhar dal

इस दाल को सबसे अधिक दक्षिण एशिया में उगाया जाता है.

प्राचीन बौद्ध व जैन साहित्य में इसी नाम से अरहर का वर्णन है. कई खंडों में कौटिल्य अर्थशास्त्रम (Kautilya Arthshastrm) लिखने वाले प्रो़. आरपी कांगले ने जानकारी दी है कि इस महान अर्थशास्त्री ने तुअर के लिए उदारका/उदाड़का शब्द प्रयोग किया है.

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अफ्रीका के जंगलों से चलकर एशिया में पहुंची यह दाल?

अरहर को लेकर दूसरी विचारधारा यह कहती है कि लाल चने के पौधे (अरहर की प्रजाति) अफ्रीका में ऊपरी नील नदी के क्षेत्रों और अंगोला के तटीय जिलों में जंगली रूप में पाए गए थे. अफ्रीका से यह दुनिया के अन्य हिस्सों एशिया और भारत में पहुंची. ऑस्ट्रेलियाई लोग इसे चारे और सब्जी के लिए उगाते हैं. यह भी कहा जा रहा है इसकी खेती प्राचीन मिस्र, अफ्रीका और एशिया में प्रागैतिहासिक काल से की जाती रही है. इसके बीज 17वीं शताब्दी में दास व्यापार के माध्यम से अमेरिका पहुंचे. फिलहाल इस दाल को सबसे अधिक दक्षिण एशिया में उगाया जाता है और यहीं पर ही इसे खूब खाया भी जाता है.

पोषक तत्वों से भरपूर है अरहर

फूड एक्सपर्ट व होमशेफ सिम्मी बब्बर के अनुसार पकी हुई 100 ग्राम अरहर की दाल में प्रोटीन 22.86 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 62.86 ग्राम, फैट 1.43 ग्राम, कैल्शियम 57 मिलीग्राम, फाइबर आहार 17.1 ग्राम, आयरन 3.09 मिलीग्राम और कैलोरी 343 होती है. इसमें आश्चर्यजनक रूप से फोलिक अम्ल भी होता है जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को लगातार रिपेयर करता रहता है. इस दाल में इसमें खनिज मैग्नीशियम, मैंगनीज, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम, जस्ता के साथ विटामिन सी, ई, के और बी कॉम्प्लेक्स भी शामिल हैं.

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अरहर दाल का सेवन एनीमिया से बचाता है और हाई बीपी कंट्रोल करता है.

यह अवयव वजन कंट्रोल करते हैं, साथ ही कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम रखते हैं. इसका सेवन शरीर को एनीमिया से बचाता है. भोजन में अगर नियमित तौर पर अरहर को शामिल किया जाए तो हाई बीपी कंट्रोल में रह सकता है.

अधिक खाने से हो सकते हैं नुकसान

उनका कहना है कि अरहर की दाल में मौजूद बी कॉम्प्लेक्स विटामिन पाचन सिस्टम को दुरुस्त रखते हैं, साथ ही फैट को बढ़ने नहीं देते. इसमें एनर्जी बढ़ाने के भी तत्व मौजूद हैं. अरहर की दाल में कार्बोहाइड्रेट खूब है लेकिन ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) कम है जो ब्लड शुगर को कम रखते हैं, इसलिए यह शुगर के मरीजों के लिए भी लाभकारी मानी जाती है. अगर अरहर की दाल ज्यादा खा ली गई तो यह पेट फुला सकती है. अगर किसी को एलर्जी की समस्या है तो उसके शरीर में पित्तियां
उभार सकती है. चूंकि इसमें प्रोटीन भरपूर है, इसलिए जिसका पाचन सिस्टम कमजोर है, वह इसके अधिक सेवन से बचें.

Tags: Food, Lifestyle

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