भारतीय थाली की शान ‘चावल’ है गुणों से भरपूर, जानें इसका आयुर्वेदिक और धार्मिक महत्व

पूरी दुनिया के खानपान में चावल (धान) का विशेष योगदान है. यह एक ऐसी खेती है, जो अंटार्कटिका को छोड़कर विश्व में हर जगह उगाई जाती है. मनुष्य की भूख शांत करने में चावल की महत्वपूर्ण भूमिका है. एशिया में पैदा हुआ चावल यहां के देशों की संस्कृति और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है. धान इसलिए विशेष है कि दुनिया का हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी रूप में चावल का सेवन करता है. भारतीयों की संस्कृति और परंपरा में घुल-मिल गया है चावल. आयुर्वेद में इसे गुणों से भरपूर बताया गया है.

खेती से जुड़े लोकगीतों में सबसे अधिक धान पर

आप हैरान हो सकते हैं कि भारत में सभी भाषाओं और बोलियों में खेती से जुड़े जितने भी लोकगीत हैं, उनमे सबसे अधिक गीत धान (चावल) की रोपाई और कटाई को लेकर हैं. उसका कारण यह है कि धान 12 महीने आहार के रूप में जुड़ा हुआ है. ‘चला सखी रोपि आई खेतवन में धान, बरसि जाई पानी रे हारी…’ जैसे सैंकड़ों लोक गीत चावल की खेती से ही जुड़े हुए हैं. चूंकि भारत कृषि प्रधान देश रहा है ऐसे में यहां लोकगीतों का समाजशास्त्रीय संदर्भ रहा है, जो कृषि समाज के सुख-दुख को व्यक्त करता है.
धान की खेती सबसे मुश्किल मानी जाती है, इसलिए गरीब किसान अपने दुख, संताप को कम करने के लिए अभावों में भी उल्लास और उत्साह से धान की रोपाई करता है, ताकि पूरे वर्ष उसे खाद्यान्न की समस्या से न जूझना पड़े. लोकगीतों के जरिए वह देवताओं का आह्वान करता है, उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयास करता है ताकि धान की खेती में संकट पैदा न हो.

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चीन की यांग्त्सी नदी घाटी से शुरू हुई खेती

चावल के इतिहास को लेकर दो विचार धाराएं हैं, विशेष बात यह है कि ये दोनों एशिया क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. अमेरिका की जानी-मानी वनस्पति विज्ञानी प्रोफेसर सुषमा नैथानी का कहना है कि धान की उत्पत्ति का केंद्र चीन व दक्षिणी पूर्वी एशिया है, जिसमें चीन के अलावा ताइवान, थाइलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, कोरिया आदि देश आते हैं. उनका कहना है कि आज से 6000 साल पहले चीन की यांग्त्सी नदी घाटी में धान की खेती शुरू हुई और हजार साल बाद दक्षिण पूर्वी एशिया के कई भू-भाग में फैल गई. इसके बाद धान की खेती मध्य पूर्व के देशों, फिर अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में भी होनी लगी. धान की विशेषता है कि वह आज दुनिया भर में अलग-अलग परिस्थितियों में उग जाता है, क्योंकि उसने हर भू-भाग की जलवायु को आत्मसात कर लिया. यही कारण है कि बर्फीले पहाड़ों से लेकर समुद्र के तटीय इलाकों तक मे धान लहलहाता है.

धान की विशेषता है कि वह आज दुनिया भर में अलग-अलग परिस्थितियों में उग जाता है

भारत में 8000 ईसा पूर्व हो रही थी खेती

एक विचारधारा का मानना है कि धान (चावल) की खेती भारत से शुरू हुई है. देश के जाने-माने पुरातत्ववेत्ता व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग से जुड़े प्रोफेसर जेएन पाल के अनुसार भारत में धान की खेती के पुरातात्विक प्रमाण पिछले दो दशकों में उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर ज़िले के लहूरादेवा इलाक़े में पाए गए. वहां खुदाई में मिले पुरातात्विक अवशेषों के अध्ययन से पता चला है कि झूसी में 9000 ईसा पूर्व व लहुरादेवा में करीब 8000 ईसा पूर्व धान की खेती होती थी. इसका अर्थ यही है कि भारत में चीन से पहले धान की खेती की जा रही थी.

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एशिया महाद्वीप की संस्कृति व परंपरा में चावल का महत्व है. हिंदू धार्मिक परंपरा में चावल को ‘अक्षत’ कहा गया है.

भारत में धान की खेती के ये सबसे प्राचीन प्रमाण हैं. इससे पहले तो कहा ही जा रहा था कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी धान की खेती होती रही. गुजरात में लोथल और रंगपुर में 2000 ईसा पूर्व सहित बिहार, मध्य प्रदेश व पश्चिम बंगाल में प्राचीन स्थलों की खुदाई से भारत की प्राचीन धान-प्रधान संस्कृति की जानकारी पाई गई है.

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धार्मिक व सामाजिक आयोजनों में महत्व है चावल का

एशिया महाद्वीप की संस्कृति व परंपरा में चावल का महत्व है. हिंदू धार्मिक परंपरा में चावल को ‘अक्षत’ कहा गया है. वेद-पुराणों में भारत के धार्मिक आयोजनों में चावल विशेष माना गया है. सभी प्रकार की पूजा व हवन आयोजनों में चावल अपनी भूमिका निभाता है. इसके अलावा शुभ कार्यों को शुरू करने के लिए धान की बाली को शुभ माना जाता है. शुभ कार्यों में चावल की खीर का भी अपना महत्व है. वैसे भारत में चावलों से बनने वाले व्यंजनों की भी समाज में अलग भूमिका है.

विश्व का 80 प्रतिशत चावल एशिया में उगता है

पूरे विश्व के खानपान में चावल की अहम भूमिका है. करीब 100 देशों में धान की खेती की जाती है और इसकी हजारों किस्में भी हैं. गरीबों के लिए मोटा सेला चावल मौजूद है तो धनाढ्यों के लिए अनेकों प्रकार के बासमती चावल हैं. दुनिया में मक्का के बाद धान की खेती की जाती है. पूरी दुनिया में जितना भी धान उगाया जाता है, उसकी 80 प्रतिशत उपज एशिया में होती है. इसमें भारत की हिस्सेदार 20 प्रतिशत है. माना जाता है कि एशिया के करीब 200 करोड़ लोग जीवन जीने के लिए धान पर निर्भर हैं. विश्व में जो पांच प्रकार के अनाज हैं, उनमें चावल ही ऐसा अनाज है, जिसकी अलग रंगत और खुशबू है.

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एशिया के करीब 200 करोड़ लोग जीवन जीने के लिए धान पर निर्भर हैं.

आयुर्वेद ग्रंथ में कई किस्म के चावल व उनके गुणों का वर्णन

सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व में लिखे गए आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में चावल की कई किस्में और उनके गुण-दोष बताए गए हैं. ग्रंथ में शालि, यवक, धान्य, कोरदूष, ब्रीहिधान्य, हस्तिश्यामाक, नीवार, लोहवाक, सुगंधक आदि 15 चावलों की किस्में बताई हैं और कहा गया है कि लाल चावल श्रेष्ठ है. यह यह त्रिदोषनाशक है और तृष्णा को नष्ट करता है. ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि चावल स्निग्ध, शीतल, मधुर होता है, लेकिन यह कफ व पित्त को बढ़ाता है और अधिक यूरिन पैदा करता है.

तत्काल ऊर्जा प्रदान करता है, बुढ़ापे को धीमा करता है

देश के जाने-माने योगाचार्य आचार्य श्री बालकृष्ण के अनुसार चावल में तत्काल उर्जा प्राप्त करने, ब्लड शुगर को स्थिर करने और बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करने की क्षमता होती है. चावल के इस्तेमाल से पीलिया, बवासीर, उल्टी और दस्त सहित अनेक रोगों का इलाज किया जाता है. चावल खाने के नुकसान यह है कि मधुमेह ग्रस्त लोगों की यह शुगर बढ़ा सकता है. ज्यादा खाने से मोटापा बढ़ सकता है, पेट से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं. अधिक चावल से पथरी की आशंका भी बन सकती है. यह सुस्ती भी पैदा करता है और सर्दी-खांसी को भी बढ़ा सकता है.

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