कुरुक्षेत्र: चिंतन शिविर में पार्टी के साथ ही प्रथम परिवार की दिशा और दशा भी तय होगी


सार

कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के मुताबिक, पहली बार शीर्ष स्तर पर पार्टी के प्रथम परिवार के तीन नेता सक्रिय हैं- कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी। नेहरू के जमाने में भी उनके साथ इंदिरा गांधी पार्टी में सक्रिय थीं, लेकिन उनकी वह राजनीतिक हैसियत नहीं थी, जो इस समय राहुल और प्रियंका की है।

ख़बर सुनें

शुक्रवार से उदयपुर में शुरू हो रहे कांग्रेस के तीन दिवसीय चिंतन शिविर में पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस के प्रथम परिवार यानी नेहरू-गांधी परिवार की दशा और दिशा भी तय होगी। जहां देश के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर पार्टी नेतृत्व द्वारा गठित छह समूह अपनी रिपोर्ट पेश करके उस पर विस्तृत चर्चा करेंगे, वहीं इस चिंतन शिविर से कांग्रेस नेतृत्व में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की भावी भूमिकाएं भी तय हो जाएंगी। मुमकिन है कि शिविर में पार्टी संगठन के ढांचे में मूलभूत बदलाव के लिए उन सुझावों पर भी विचार हो जो पार्टी नेताओं के साथ घंटों की मैराथन बैठक में प्रशांत किशोर ने पेश किए थे।

430 नेताओं को किया आमंत्रित

कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने चिंतन शिविर के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि उदयपुर से उदित होगा देश की उम्मीदों का सूर्य। कांग्रेस ने इसे नवसंकल्प चिंतन शिविर का नाम दिया है। इस शिविर में देश भर से पार्टी के 430 नेताओं को चिंतकों के रूप में आमंत्रित किया गया है, जो कांग्रेस नेतृत्व द्वारा राजनीतिक, सामाजिक न्याय-सशक्तीकरण, अर्थव्यवस्था, किसान और खेत मजदूर, युवा सशक्तीकरण जैसे विषयों पर केंद्रित छह समूहों की नेतृत्व को सौंपी गई प्राथमिक रिपोर्ट पर तीन दिनों तक विस्तृत चर्चा करके उसका निचोड़ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने रखेंगे और पार्टी भविष्य की रणनीति और आगे के कामकाज का खाका खींचेगी।
 

दिलचस्प है कि इस शिविर में जहां टीम राहुल मानी जाने वाली पीढ़ी के नेताओं को बुलाया गया है, वहीं राजीव गांधी और सोनिया गांधी के जमाने से पार्टी में सक्रिय उन पुराने नेताओं को भी याद किया गया है, जो पिछले काफी समय से कांग्रेस के कामकाज से न सिर्फ दूर हैं, बल्कि नेतृत्व की जड़ता और पार्टी की कार्यशैली पर सवाल भी उठाते रहे हैं। इनमें जी-23 के नाम से मशहूर कई वे नेता भी हैं, जिन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर अपनी आवाज उठाई थी। इनमें गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेता न सिर्फ शिविर में आमंत्रित हैं, बल्कि इनमें कुछ को गठित समूहों का प्रमुख भी बनाया गया है। ऐसा करके कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी में सब कुछ ठीकठाक होने और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है।

पुराने दिग्गजों को भी बुलाया

इसके साथ ही इंदिरा गांधी के जमाने से लेकर सोनिया गांधी तक लंबे समय कांग्रेस संगठन में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहने वाले वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी को भी विशेष रूप से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने शिविर में बुलाया है। अपनी खरी और स्पष्ट राय रखने के लिए मशहूर जनार्दन द्विवेदी ने पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस के महासचिव (संगठन) जैसे अति महत्वपूर्ण पद से इस्तीफा देकर पार्टी संगठन के कामकाज से खुद को अलग कर लिया था। राज्यसभा में भी उनका कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका है। लेकिन अचानक उन्हें शिविर में बुलाकर नेतृत्व ने चिंतन शिविर की गंभीरता का संकेत दिया है।
 

कांग्रेस के इस चिंतन शिविर पर सबकी निगाहें हैं। क्योंकि इसके पहले कांग्रेस के पंचमढ़ी सम्मेलन और शिमला शिविर से निकली पार्टी की दिशा ने कांग्रेस को खासी ताकत दी थी। कांग्रेस ने अपनी एकला चलो की नीति का परित्याग करके केंद्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया था। इसी तरह 2013 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में ही राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था और राहुल के उस भाषण की देश भर में चर्चा हुई थी, जिसमें उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी का हवाला देते हुए कहा था कि मां ने उन्हें बताया है कि सत्ता जहर का प्याला है, जिसे पीना पड़ता है। जयपुर अधिवेशन में ही कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद के उस विवादित जुमले को गढ़ा था, जो उसकी एतिहासिक भूल साबित हुई और भाजपा ने उसे जमकर भुनाया। इसलिए उदयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस भविष्य के लिए क्या रणनीतिक और राजनीतिक लाईन लेती है, भाजपा द्वारा पेश की गई चुनौतियों जिनमें राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर कांग्रेस को लगातार बचाव की मुद्रा में लाना सबसे अहम है, की काट के लिए चिंतन शिविर से क्या विमर्श (नैरेटिव) निकलता है, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा।
 

कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के मुताबिक पहली बार शीर्ष स्तर पर पार्टी के प्रथम परिवार के तीन नेता सक्रिय हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी। जबकि नेहरू के जमाने में उनके साथ इंदिरा गांधी पार्टी में सक्रिय थीं, लेकिन उनकी वह राजनीतिक हैसियत नहीं थी, जो इस समय राहुल और प्रियंका की है। इंदिरा के जमाने में पहले उनके साथ संजय गांधी और फिर बाद में राजीव गांधी पार्टी में प्रभावशाली भूमिका में रहे। राजीव गांधी के जमाने में परिवार का कोई दूसरा सदस्य पार्टी में सक्रिय नहीं हुआ। सोनिया गांधी के समय 2004 से 2019 तक राहुल गांधी विभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी अध्यक्ष तक बने। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रियंका गांधी ने भी सक्रिय राजनीति में शामिल होकर महासचिव पद संभाला। उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई जो 2022 के विधानसभा चुनावों तक जारी रही।
 

इसके साथ ही राजीव गांधी के जमाने से पार्टी और परिवार के बेहद वफादार माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को भी शिविर में बुलाया गया है। पचौरी न सिर्फ पार्टी संगठन में कांग्रेस सेवादल से लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर रहे हैं, बल्कि यूपीए सरकार में वह बेहद संवेदनशील विभाग कार्मिक मामलों के मंत्री थे और उन्होंने सरकार और पार्टी की तमाम उलझनों में संकट मोचक भूमिका भी निभाई। एक जमाने में दिग्गज नेता और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के भी सुरेश पचौरी काफी करीब थे और पटेल तमाम सियासी ऑपरेशन में उनकी मदद लेते थे। 2018 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद से ही सुरेश पचौरी दिल्ली छोड़कर भोपाल में रह रहे हैं और तब से पार्टी संगठन में उन्हें लगभग भुला दिया गया था। पचौरी को शिविर में बुलाकर एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पुराने वफादारों को फिर सक्रिय करने का संकेत दिया है तो वहीं मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अलावा एक और वरिष्ठ नेता की राय भी शिविर में सुनी जाएगी।

प्रथम परिवार के तीनों चेहरों के करिश्मे पर भी सवाल

जहां प्रथम परिवार के तीन सदस्यों का शीर्ष स्तर पर सक्रिय होने से कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं को लगता था कि इससे पार्टी को ताकत मिलेगी और गांधी परिवार की लोकप्रियता सियासी करिश्मा कर देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी न सिर्फ 2019 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी, बल्कि उसके बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों में कहीं भी अपने बलबूते सरकार नहीं बना पाई। हरियाणा में पिछले चुनाव की अपेक्षा उसका प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी। जबकि झारखंड में कांग्रेस को झामुमो और तमिलनाडु में द्रमुक की बैसाखी का सहारा लेना पड़ा और महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ गठबंधन के बावजूद चुनाव के बाद उसे उस शिवसेना से हाथ मिलाना पड़ा, जिसके साथ उसका धुर विरोध रहा था। बाकी राज्यों असम, केरल, प.बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सब जगह कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने पूरा चुनाव प्रियंका गांधी के बलबूते और उनके करिश्मे पर लड़ा। ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के नारे से कांग्रेस ने वहां सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति को लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) से बदलकर नया राजनीतिक विमर्श बनाने की कोशिश की। लेकिन चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को 2017 की सात सीटों और छह फीसदी वोट से भी खासा नीचे दो सीटें और नाममात्र के वोट प्रतिशत पर पहुंचा दिया। केरल में कांग्रेस को सरकार बनाने की उम्मीद थी, लेकिन वहां पार्टी पिछले प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा पाई जबकि राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं।
 

इन तमाम चुनावी नतीजों ने पार्टी के प्रथम परिवार के तीनों चेहरों के करिश्मे पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। मुद्दा है कि क्या चिंतन शिविर में नेता इस पर विचार करेंगे या कांग्रेसी परंपरा का पालन करते हुए इस सवाल को अनदेखा करके राहुल लाओ देश बचाओ और प्रियंका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है जैसे नारे लगाकर राहुल गांधी के दोबारा अध्यक्ष बनने और प्रियंका को राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय करने का दबाव बनाएंगे। कांग्रेस सूत्रों का यह कहना है कि प्रियंका गांधी अब खुद को महज उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखना चाहती हैं। वह चाहती हैं कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर की भूमिका मिले और वह पार्टी संगठन के फैसलों में ज्यादा दखल दे सकें। हालांकि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने से लेकर छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी के ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले का उल्लंघन करके टीएस सिंहदेव के दावे को दरकिनार करते हुए भूपेश बघेल को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने जैसे फैसलों में प्रियंका की अहम भूमिका रही है। उत्तर प्रदेश में तो हर फैसला प्रियंका गांधी के हिसाब से ही हुआ। सूत्रों का यह भी कहना है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों की चुनावी विफलता ने पार्टी के भीतर प्रियंका को दबाव में ला दिया है और अब प्रियंका चाहती हैं कि अगर सोनिया गांधी बैकसीट लेती हैं, और राहुल गांधी अध्यक्ष बनते हैं, तो कांग्रेस नेतृत्व में उनकी वही भूमिका हो जो इंदिरा गांधी के साथ पहले संजय गांधी और फिर राजीव गांधी की और सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी की है। वहीं सोनिया और राहुल की दुविधा है कि कांग्रेस पर लगने वाले परिवारवाद और एक ही परिवार पर आश्रित रहने के आरोपों के मद्देनजर पार्टी में भीतर से यह दबाव बन रहा है कि परिवार का एक ही सदस्य लोकसभा चुनाव लड़े और अहम भूमिका में रहे। किसी गैर गांधी नेता को भी महत्वपूर्ण भूमिका सौंपे जाने की बात भी पार्टी में उठ रही है। अगर यह स्वर प्रभावी हुआ तो पार्टी के प्रथम परिवार को तय करना होगा कि उनमें कौन किस भूमिका में होगा।

महज राजनीतिक कर्मकांड बनकर न रह जाए शिविर

पार्टी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी पार्टी संगठन के कामकाज में परिवार की भूमिका सीमित करने के पक्ष में हैं। राहुल के एक बेहद करीबी सूत्र के मुताबिक अगर जरूरत हुई, तो राहुल खुद को भी अध्यक्ष पद की दावेदारी से हटा सकते हैं। हालांकि पार्टी के भीतर राहुल को दोबारा अध्यक्ष बनाने का माहौल बनता जा रहा है और चिंतन शिविर में यह मांग जोरदार तरीके से उठ सकती है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभालें। कांग्रेस के एक नेता जो लंबे समय तक पार्टी की भीतरी राजनीति में सक्रिय रहे हैं, उनका कहना है कि जिस तरह शिविर में कांग्रेस के सभी मोर्चा संगठनों युवक कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल, अल्पसंख्यक सेल, किसान सेल, पंचायती राज शाखा के पदाधिकारियों को शिविर में बुलाया गया है, उससे साफ हो जाता है कि राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग शिविर में इतने जोरदार तरीके से उठेगी कि किसी को भी कुछ अलग कहने का न साहस बचेगा न गुंजाईश।

इसलिए चिंतन शिविर में जहां भाजपा और केंद्र सरकार द्वारा कांग्रेस के सामने प्रस्तुत चुनौतियों, देश के आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कांग्रेस को अपनी रीति नीति तय करनी है वहां नेतृत्व के स्तर पर परिवार विचार और पार्टी के अंतर्विरोधों का समाधान भी खोजना होगा। अगर कांग्रेस इन सारे मसलों को हल करने में कामयाब रही तो निश्चित रूप से उदयपुर से कांग्रेस की उम्मीदों का सूर्य उदय होगा। लेकिन अगर पार्टी सिर्फ परिवार के प्रति निष्ठा प्रदर्शन की होड़ में फंसकर वास्तविक सवालों और चुनौतियों को अनदेखा करती है तो उदयपुर का चिंतन शिविर महज एक राजनीतिक कर्मकांड बनकर रह जाएगा।

विस्तार

शुक्रवार से उदयपुर में शुरू हो रहे कांग्रेस के तीन दिवसीय चिंतन शिविर में पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस के प्रथम परिवार यानी नेहरू-गांधी परिवार की दशा और दिशा भी तय होगी। जहां देश के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर पार्टी नेतृत्व द्वारा गठित छह समूह अपनी रिपोर्ट पेश करके उस पर विस्तृत चर्चा करेंगे, वहीं इस चिंतन शिविर से कांग्रेस नेतृत्व में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की भावी भूमिकाएं भी तय हो जाएंगी। मुमकिन है कि शिविर में पार्टी संगठन के ढांचे में मूलभूत बदलाव के लिए उन सुझावों पर भी विचार हो जो पार्टी नेताओं के साथ घंटों की मैराथन बैठक में प्रशांत किशोर ने पेश किए थे।

430 नेताओं को किया आमंत्रित

कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने चिंतन शिविर के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि उदयपुर से उदित होगा देश की उम्मीदों का सूर्य। कांग्रेस ने इसे नवसंकल्प चिंतन शिविर का नाम दिया है। इस शिविर में देश भर से पार्टी के 430 नेताओं को चिंतकों के रूप में आमंत्रित किया गया है, जो कांग्रेस नेतृत्व द्वारा राजनीतिक, सामाजिक न्याय-सशक्तीकरण, अर्थव्यवस्था, किसान और खेत मजदूर, युवा सशक्तीकरण जैसे विषयों पर केंद्रित छह समूहों की नेतृत्व को सौंपी गई प्राथमिक रिपोर्ट पर तीन दिनों तक विस्तृत चर्चा करके उसका निचोड़ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने रखेंगे और पार्टी भविष्य की रणनीति और आगे के कामकाज का खाका खींचेगी।

 

दिलचस्प है कि इस शिविर में जहां टीम राहुल मानी जाने वाली पीढ़ी के नेताओं को बुलाया गया है, वहीं राजीव गांधी और सोनिया गांधी के जमाने से पार्टी में सक्रिय उन पुराने नेताओं को भी याद किया गया है, जो पिछले काफी समय से कांग्रेस के कामकाज से न सिर्फ दूर हैं, बल्कि नेतृत्व की जड़ता और पार्टी की कार्यशैली पर सवाल भी उठाते रहे हैं। इनमें जी-23 के नाम से मशहूर कई वे नेता भी हैं, जिन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर अपनी आवाज उठाई थी। इनमें गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेता न सिर्फ शिविर में आमंत्रित हैं, बल्कि इनमें कुछ को गठित समूहों का प्रमुख भी बनाया गया है। ऐसा करके कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी में सब कुछ ठीकठाक होने और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है।

पुराने दिग्गजों को भी बुलाया

इसके साथ ही इंदिरा गांधी के जमाने से लेकर सोनिया गांधी तक लंबे समय कांग्रेस संगठन में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहने वाले वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी को भी विशेष रूप से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने शिविर में बुलाया है। अपनी खरी और स्पष्ट राय रखने के लिए मशहूर जनार्दन द्विवेदी ने पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस के महासचिव (संगठन) जैसे अति महत्वपूर्ण पद से इस्तीफा देकर पार्टी संगठन के कामकाज से खुद को अलग कर लिया था। राज्यसभा में भी उनका कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका है। लेकिन अचानक उन्हें शिविर में बुलाकर नेतृत्व ने चिंतन शिविर की गंभीरता का संकेत दिया है।

 

कांग्रेस के इस चिंतन शिविर पर सबकी निगाहें हैं। क्योंकि इसके पहले कांग्रेस के पंचमढ़ी सम्मेलन और शिमला शिविर से निकली पार्टी की दिशा ने कांग्रेस को खासी ताकत दी थी। कांग्रेस ने अपनी एकला चलो की नीति का परित्याग करके केंद्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया था। इसी तरह 2013 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में ही राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था और राहुल के उस भाषण की देश भर में चर्चा हुई थी, जिसमें उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी का हवाला देते हुए कहा था कि मां ने उन्हें बताया है कि सत्ता जहर का प्याला है, जिसे पीना पड़ता है। जयपुर अधिवेशन में ही कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद के उस विवादित जुमले को गढ़ा था, जो उसकी एतिहासिक भूल साबित हुई और भाजपा ने उसे जमकर भुनाया। इसलिए उदयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस भविष्य के लिए क्या रणनीतिक और राजनीतिक लाईन लेती है, भाजपा द्वारा पेश की गई चुनौतियों जिनमें राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर कांग्रेस को लगातार बचाव की मुद्रा में लाना सबसे अहम है, की काट के लिए चिंतन शिविर से क्या विमर्श (नैरेटिव) निकलता है, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा।

 

कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के मुताबिक पहली बार शीर्ष स्तर पर पार्टी के प्रथम परिवार के तीन नेता सक्रिय हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी। जबकि नेहरू के जमाने में उनके साथ इंदिरा गांधी पार्टी में सक्रिय थीं, लेकिन उनकी वह राजनीतिक हैसियत नहीं थी, जो इस समय राहुल और प्रियंका की है। इंदिरा के जमाने में पहले उनके साथ संजय गांधी और फिर बाद में राजीव गांधी पार्टी में प्रभावशाली भूमिका में रहे। राजीव गांधी के जमाने में परिवार का कोई दूसरा सदस्य पार्टी में सक्रिय नहीं हुआ। सोनिया गांधी के समय 2004 से 2019 तक राहुल गांधी विभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी अध्यक्ष तक बने। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रियंका गांधी ने भी सक्रिय राजनीति में शामिल होकर महासचिव पद संभाला। उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई जो 2022 के विधानसभा चुनावों तक जारी रही।

 

इसके साथ ही राजीव गांधी के जमाने से पार्टी और परिवार के बेहद वफादार माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को भी शिविर में बुलाया गया है। पचौरी न सिर्फ पार्टी संगठन में कांग्रेस सेवादल से लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर रहे हैं, बल्कि यूपीए सरकार में वह बेहद संवेदनशील विभाग कार्मिक मामलों के मंत्री थे और उन्होंने सरकार और पार्टी की तमाम उलझनों में संकट मोचक भूमिका भी निभाई। एक जमाने में दिग्गज नेता और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के भी सुरेश पचौरी काफी करीब थे और पटेल तमाम सियासी ऑपरेशन में उनकी मदद लेते थे। 2018 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद से ही सुरेश पचौरी दिल्ली छोड़कर भोपाल में रह रहे हैं और तब से पार्टी संगठन में उन्हें लगभग भुला दिया गया था। पचौरी को शिविर में बुलाकर एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पुराने वफादारों को फिर सक्रिय करने का संकेत दिया है तो वहीं मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अलावा एक और वरिष्ठ नेता की राय भी शिविर में सुनी जाएगी।

प्रथम परिवार के तीनों चेहरों के करिश्मे पर भी सवाल

जहां प्रथम परिवार के तीन सदस्यों का शीर्ष स्तर पर सक्रिय होने से कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं को लगता था कि इससे पार्टी को ताकत मिलेगी और गांधी परिवार की लोकप्रियता सियासी करिश्मा कर देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी न सिर्फ 2019 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी, बल्कि उसके बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों में कहीं भी अपने बलबूते सरकार नहीं बना पाई। हरियाणा में पिछले चुनाव की अपेक्षा उसका प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी। जबकि झारखंड में कांग्रेस को झामुमो और तमिलनाडु में द्रमुक की बैसाखी का सहारा लेना पड़ा और महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ गठबंधन के बावजूद चुनाव के बाद उसे उस शिवसेना से हाथ मिलाना पड़ा, जिसके साथ उसका धुर विरोध रहा था। बाकी राज्यों असम, केरल, प.बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सब जगह कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने पूरा चुनाव प्रियंका गांधी के बलबूते और उनके करिश्मे पर लड़ा। ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के नारे से कांग्रेस ने वहां सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति को लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) से बदलकर नया राजनीतिक विमर्श बनाने की कोशिश की। लेकिन चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को 2017 की सात सीटों और छह फीसदी वोट से भी खासा नीचे दो सीटें और नाममात्र के वोट प्रतिशत पर पहुंचा दिया। केरल में कांग्रेस को सरकार बनाने की उम्मीद थी, लेकिन वहां पार्टी पिछले प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा पाई जबकि राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं।

 

इन तमाम चुनावी नतीजों ने पार्टी के प्रथम परिवार के तीनों चेहरों के करिश्मे पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। मुद्दा है कि क्या चिंतन शिविर में नेता इस पर विचार करेंगे या कांग्रेसी परंपरा का पालन करते हुए इस सवाल को अनदेखा करके राहुल लाओ देश बचाओ और प्रियंका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है जैसे नारे लगाकर राहुल गांधी के दोबारा अध्यक्ष बनने और प्रियंका को राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय करने का दबाव बनाएंगे। कांग्रेस सूत्रों का यह कहना है कि प्रियंका गांधी अब खुद को महज उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखना चाहती हैं। वह चाहती हैं कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर की भूमिका मिले और वह पार्टी संगठन के फैसलों में ज्यादा दखल दे सकें। हालांकि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने से लेकर छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी के ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले का उल्लंघन करके टीएस सिंहदेव के दावे को दरकिनार करते हुए भूपेश बघेल को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने जैसे फैसलों में प्रियंका की अहम भूमिका रही है। उत्तर प्रदेश में तो हर फैसला प्रियंका गांधी के हिसाब से ही हुआ। सूत्रों का यह भी कहना है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों की चुनावी विफलता ने पार्टी के भीतर प्रियंका को दबाव में ला दिया है और अब प्रियंका चाहती हैं कि अगर सोनिया गांधी बैकसीट लेती हैं, और राहुल गांधी अध्यक्ष बनते हैं, तो कांग्रेस नेतृत्व में उनकी वही भूमिका हो जो इंदिरा गांधी के साथ पहले संजय गांधी और फिर राजीव गांधी की और सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी की है। वहीं सोनिया और राहुल की दुविधा है कि कांग्रेस पर लगने वाले परिवारवाद और एक ही परिवार पर आश्रित रहने के आरोपों के मद्देनजर पार्टी में भीतर से यह दबाव बन रहा है कि परिवार का एक ही सदस्य लोकसभा चुनाव लड़े और अहम भूमिका में रहे। किसी गैर गांधी नेता को भी महत्वपूर्ण भूमिका सौंपे जाने की बात भी पार्टी में उठ रही है। अगर यह स्वर प्रभावी हुआ तो पार्टी के प्रथम परिवार को तय करना होगा कि उनमें कौन किस भूमिका में होगा।

महज राजनीतिक कर्मकांड बनकर न रह जाए शिविर

पार्टी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी पार्टी संगठन के कामकाज में परिवार की भूमिका सीमित करने के पक्ष में हैं। राहुल के एक बेहद करीबी सूत्र के मुताबिक अगर जरूरत हुई, तो राहुल खुद को भी अध्यक्ष पद की दावेदारी से हटा सकते हैं। हालांकि पार्टी के भीतर राहुल को दोबारा अध्यक्ष बनाने का माहौल बनता जा रहा है और चिंतन शिविर में यह मांग जोरदार तरीके से उठ सकती है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभालें। कांग्रेस के एक नेता जो लंबे समय तक पार्टी की भीतरी राजनीति में सक्रिय रहे हैं, उनका कहना है कि जिस तरह शिविर में कांग्रेस के सभी मोर्चा संगठनों युवक कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल, अल्पसंख्यक सेल, किसान सेल, पंचायती राज शाखा के पदाधिकारियों को शिविर में बुलाया गया है, उससे साफ हो जाता है कि राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग शिविर में इतने जोरदार तरीके से उठेगी कि किसी को भी कुछ अलग कहने का न साहस बचेगा न गुंजाईश।

इसलिए चिंतन शिविर में जहां भाजपा और केंद्र सरकार द्वारा कांग्रेस के सामने प्रस्तुत चुनौतियों, देश के आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कांग्रेस को अपनी रीति नीति तय करनी है वहां नेतृत्व के स्तर पर परिवार विचार और पार्टी के अंतर्विरोधों का समाधान भी खोजना होगा। अगर कांग्रेस इन सारे मसलों को हल करने में कामयाब रही तो निश्चित रूप से उदयपुर से कांग्रेस की उम्मीदों का सूर्य उदय होगा। लेकिन अगर पार्टी सिर्फ परिवार के प्रति निष्ठा प्रदर्शन की होड़ में फंसकर वास्तविक सवालों और चुनौतियों को अनदेखा करती है तो उदयपुर का चिंतन शिविर महज एक राजनीतिक कर्मकांड बनकर रह जाएगा।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published.